युद्ध के परिप्रेक्ष्य में चीन
श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी ने आज दिनांक 30/4/2020 को राष्ट्र को संबोधित करते हुए अनलॉक 2 का ऐलान किया। उस समय अगले 5 महिनों के लिए गरीब गरजमंदों के लिए सुविधाएं बढ़ाने का ऐलान किया। अंदेशा था कि उनके इस संबोधन में की और मुद्दे भी चर्चा में आएंगे लेकिन उन्होंने सबको आश्चर्यचकित करते हुए केवल 16 मिनट में भाषण समाप्त किया। जो आस लगाए बैठे थे कि तब से आगे कुछ अंतराल तक उठ बैठ दिन रात यहां वहां हर कहीं ताल बेताल गप्प लड़ने का सामान निकल आएगा और सरकार को घेरने की कोई जुगत ढूंढ ली जाएगी। मगर मोदीजी ने यहां भी विरोधियों को बिना हथियार उठाए, बिना धक्कमपेल किये ही परास्त कर दिया।
कल की तारीख में चायना के 59 ऐप्स बंद करवा कर अलबत्ता एक चपत चीन को जरूर लगाई है मगर व्यावहारिक तौर पर देखें तो इससे चीन सरकार कोई सबक लेंगी ऐसा प्रभाव इस निर्णय का होगा नहीं, वजह ये कि इससे चीन का बड़ भारी आर्थिक नुकसान होगा ऐसा नहीं है। वास्तव ये है कि चीनी वस्तुओं का,कच्चे सामान का भारतीय उत्पाद में काफी ज्यादा उपयोग किया जाता है। मुख्यत: ऐसा होता आया है क्यौं कि जागतिक खुली व्यापार व्यवस्था का प्रचलन इस तरह कामयाब रहा कि पूरे विश्व में मनचाहा व्यापार सहजता से होने लगा। लाजमी है कि भारत जैसे अन्य कितने ही देश चीनी वस्तुओं तथा कच्चे सामान की तरफ आकर्षित हुए। उन्हें अपनी उत्पाद कीमत वाजिब रखना आसान हुआ।
जिस वक्त वर्ल्ड ट्रेड आर्गनाइजेशन की स्थापना हुई तब किसी ने भी इस बात का आकलन नहीं किया था कि कभी ऐसा समय भी आएगा की इस निर्णय से चीन सुपर पॉवर बनने की होड़ में सबसे बड़ा प्रत्याशी बन कर उभरेगा। वर्ल्ड ट्रेड की मुक्त व्यवस्था से विकसित देशों को अधिक फायदा पहुंचाने की इच्छा रखकर ही उसका क्रियान्वयन किया गया। लेकिन परिणाम कुछ अलग ही निकल आया है और चीन और भारत दोनों ही एशियाई देश दुनिया के बाजार पर अधिपत्य स्थापित करने की संभावनाएं बनती गई।
भारत जो एक लोकतांत्रिक देश है और जहां की सरकार जनता को जवाब देने को बाध्य है वहां राजकीय व्यक्तियों को समग्र मूल्यांकन करके ही अपने कदम बढ़ाने होते हैं और उसी कारण भारत में प्रर्यावरण लक्षी विकास पर जोर दिया गया है। जबकि, दशकों भूखमरी और गरीबी से तंग चीन सरकार ने इसे अवसर मानकर अंधाधुंध उत्पादन पर जोर दिया। प्रदूषण के साथ चीन में औसत आरोग्य स्थिती चिंताजनक है, दुनिया ने इस बात की तस्दीक की है।
मानव संसाधन कम से कम दामों में उपलब्ध होने के कारण उनके उत्पादों की कीमतों की बराबरी करना दुनिया के किसी भी देश के बस में न था न है, अतः हर एक वस्तु चीन से आयात कर मुनाफा कमाने में ही व्यापारी गण मश्गुल रहा, बिना सोचे समझे कि कभी हमें आत्म निर्भर बनने की नौबत आएगी।
आज जब चीन आंखें दिखाने लगा तब सब की घोर निद्रा टूटी है और आनन फानन इंतजाम किए जा रहे हैं। मगरूर चीनी शियासतदान इस गलतफहमी में है की दुनिया उनके बग़ैर चल नहीं सकती। पर इतिहास गवाह है सदियों से ऐसा होता आया है कि कोई साम्राज्य विकसित होने पर अधिक शक्तिशाली बनने की महत्वाकांक्षा से मदांध होकर जहान पर कब्जा करने की कोशिश में उल्टे तहस नहस हो गये है।
अब बारी चीन की है, चंद छोटे देश को छोड़कर बाकी सारा विश्व आज चीन की मस्ती का हनन करने का मनसुबा पाले हुए हैं। दु:ख इस बात का है की कंज्युमर गुड्स बेचकर पैसा कमाने वाला चीन हकीकत को भुलाकर दुनिया से दुष्मनी करने पर आमादा है। अगर युद्ध हुआ तो चीन जो आज ही आर्थिक तंगी से जूझ रहा है पूरी तरह तबाह हो जाएगा और चीनी जनता जो बेचारी अभी अभी कुछ खुशनुमा जिंदगी का अनुभव करने लगी है फिर एक बार अव्यवस्था और गरीबी की गर्त में धकेल दी जाएगी।
रविन्द्र सरदेशमुख
कल की तारीख में चायना के 59 ऐप्स बंद करवा कर अलबत्ता एक चपत चीन को जरूर लगाई है मगर व्यावहारिक तौर पर देखें तो इससे चीन सरकार कोई सबक लेंगी ऐसा प्रभाव इस निर्णय का होगा नहीं, वजह ये कि इससे चीन का बड़ भारी आर्थिक नुकसान होगा ऐसा नहीं है। वास्तव ये है कि चीनी वस्तुओं का,कच्चे सामान का भारतीय उत्पाद में काफी ज्यादा उपयोग किया जाता है। मुख्यत: ऐसा होता आया है क्यौं कि जागतिक खुली व्यापार व्यवस्था का प्रचलन इस तरह कामयाब रहा कि पूरे विश्व में मनचाहा व्यापार सहजता से होने लगा। लाजमी है कि भारत जैसे अन्य कितने ही देश चीनी वस्तुओं तथा कच्चे सामान की तरफ आकर्षित हुए। उन्हें अपनी उत्पाद कीमत वाजिब रखना आसान हुआ।
जिस वक्त वर्ल्ड ट्रेड आर्गनाइजेशन की स्थापना हुई तब किसी ने भी इस बात का आकलन नहीं किया था कि कभी ऐसा समय भी आएगा की इस निर्णय से चीन सुपर पॉवर बनने की होड़ में सबसे बड़ा प्रत्याशी बन कर उभरेगा। वर्ल्ड ट्रेड की मुक्त व्यवस्था से विकसित देशों को अधिक फायदा पहुंचाने की इच्छा रखकर ही उसका क्रियान्वयन किया गया। लेकिन परिणाम कुछ अलग ही निकल आया है और चीन और भारत दोनों ही एशियाई देश दुनिया के बाजार पर अधिपत्य स्थापित करने की संभावनाएं बनती गई।
भारत जो एक लोकतांत्रिक देश है और जहां की सरकार जनता को जवाब देने को बाध्य है वहां राजकीय व्यक्तियों को समग्र मूल्यांकन करके ही अपने कदम बढ़ाने होते हैं और उसी कारण भारत में प्रर्यावरण लक्षी विकास पर जोर दिया गया है। जबकि, दशकों भूखमरी और गरीबी से तंग चीन सरकार ने इसे अवसर मानकर अंधाधुंध उत्पादन पर जोर दिया। प्रदूषण के साथ चीन में औसत आरोग्य स्थिती चिंताजनक है, दुनिया ने इस बात की तस्दीक की है।
मानव संसाधन कम से कम दामों में उपलब्ध होने के कारण उनके उत्पादों की कीमतों की बराबरी करना दुनिया के किसी भी देश के बस में न था न है, अतः हर एक वस्तु चीन से आयात कर मुनाफा कमाने में ही व्यापारी गण मश्गुल रहा, बिना सोचे समझे कि कभी हमें आत्म निर्भर बनने की नौबत आएगी।
आज जब चीन आंखें दिखाने लगा तब सब की घोर निद्रा टूटी है और आनन फानन इंतजाम किए जा रहे हैं। मगरूर चीनी शियासतदान इस गलतफहमी में है की दुनिया उनके बग़ैर चल नहीं सकती। पर इतिहास गवाह है सदियों से ऐसा होता आया है कि कोई साम्राज्य विकसित होने पर अधिक शक्तिशाली बनने की महत्वाकांक्षा से मदांध होकर जहान पर कब्जा करने की कोशिश में उल्टे तहस नहस हो गये है।
अब बारी चीन की है, चंद छोटे देश को छोड़कर बाकी सारा विश्व आज चीन की मस्ती का हनन करने का मनसुबा पाले हुए हैं। दु:ख इस बात का है की कंज्युमर गुड्स बेचकर पैसा कमाने वाला चीन हकीकत को भुलाकर दुनिया से दुष्मनी करने पर आमादा है। अगर युद्ध हुआ तो चीन जो आज ही आर्थिक तंगी से जूझ रहा है पूरी तरह तबाह हो जाएगा और चीनी जनता जो बेचारी अभी अभी कुछ खुशनुमा जिंदगी का अनुभव करने लगी है फिर एक बार अव्यवस्था और गरीबी की गर्त में धकेल दी जाएगी।
रविन्द्र सरदेशमुख

1 Comments:
Informative.
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