वतन परस्ती
अहले वतन तेरे लिए दिलो जां कुर्बान
मेरा हर पल हर आरज़ू कुर्बान
जूस्तजू है कि फना होने से पहले
खातिरे वतन कर दूं सबकुछ कुर्बान
ज़ेहन में अब जो कुछ भी बाकी है दमखम
वतन परस्ती की मिसाल पर कुर्बान
करुं क्या याद उन्हें जो भुलाए न गये
उनके किरदारों की अलमस्ती पे कुर्बान
ख़ुदा करें के एक बार मुझे अहसान बख्शे
उस जनम के पहले हो जाऊं वतन पे कुर्बान
कवि 'रवि'

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