Friday, 9 February 2024

शेर ए-दिले नासाज़

खामोशी एक पैगाम बन गई यारों

नज़र इन्तेक़ाम बन गई यारों

मैकदे की दहलीज़ तक पहुंचें भी नहीं

चर्चा सरेआम बन गई यारों


के अब आशना है दिल अदबगोई से

गूफ्तगू करता है दिल तलबगोई से

मैं मेरा दिल मेरा आलमे तन्हाई 

अक्सर उलझते हैं साफगोई से 


आंख भर आई तो जाम छलका

पैमाना ऐ इश्क इस तरह छलका

न दवा न दुआ भी काम आईं

दो बूंदों से क्यों कर सैलाब छलका 

कवि 'रवि'


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