ना देखो ख्वाब तुम इतने
ना देखो ख्वाब तुम इतने
कि संजोए भी जाएं ना
ख़फ़ा गर होगी किस्मत तो
एक क़तरा भी पाएं ना
हवाला फिर भी दिल देता
तसल्ली रख सुबह होगी
बची ना है उमर अब तो
सहारा कोई पाएं ना
दीवानों की हकीकत क्या
खयालों के फसाने है
रही उम्मीद पल दर पल
नज़र पर कोई आएं ना
अकीदत की इंतहा 'रवि'
सवालों में यूं उलझी है
रू ब रू है वो क़ासिद पर
जिस्म से रूह जाएं ना
कवि 'रवि'

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