असमर्थता
उस पार
एक शोला मुझे
सितारे सा बना नजर आता है
इसपार की रोशनी
अब कुछ और धीमीसी ।
खटिया पर खाँसते उस बूढे की कराह
किसी गर्त से उभरती सी |
साँसों का संघर्ष
साँसों के लिये ।
आत्मा
तेरे भाग्य में केवल वेदनाऐं है
और शरीर
तेरा प्राक्तन है त्याग |
उपभोग
तेरी मृगया
त्वचा के बाणों से
कुशल प्रयत्नों के बाद भी जीत तुम्हारी है
असमर्थ हाथ
अब उठते हैं दुआ माँगने
खटिया पर के बूढे को जीत कितनी प्यारी है।
कवि'रवि'

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