सहर और शबनम
शबनमी बूंदें सहर की किरणों में जब हीरों सी चमकती है, यकीन मानो दोस्तों मूझे बचपन की याद आती है। आज उम्र के इस पड़ाव पर चौथी मंजिल के घरनुमा कफ़स में कैद अधखुले दरीचे से जब मैं झांकता हूं दरीचे के उस पार, शाहजहां आगरे के क़िले से बाहर देखकर कैसा महसूस करता होगा इसका एहसास होता है। शुभ प्रभात की शुभकामनाएं देते हुए एक इल्तज़ा करता हूं कि भाइयों "सुबह जल्दी उठा करो"🤠🤠🤠🤠
कवि'रवि'

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home