Thursday, 10 June 2021

सहर और शबनम

शबनमी बूंदें सहर की किरणों में जब हीरों सी चमकती है, यकीन मानो दोस्तों मूझे बचपन की याद आती है। आज उम्र के इस पड़ाव पर चौथी मंजिल के घरनुमा कफ़स में कैद अधखुले दरीचे से जब मैं झांकता हूं दरीचे के उस पार, शाहजहां आगरे के क़िले से बाहर देखकर कैसा महसूस करता होगा इसका एहसास होता है। शुभ प्रभात की शुभकामनाएं देते हुए एक इल्तज़ा करता हूं कि भाइयों "सुबह जल्दी उठा करो"🤠🤠🤠🤠
कवि'रवि'

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