गज़ल
दिल बागबां है के जश्ने बहार है
गुलों पर इक अनदेखा खुमाॅंर है
मदहोश हो गया हूं मैं खुशबू ए शफ़क़ से
गुमां होता है कि मेरे दरमियां गुबार है
वो शबनमी चमक वो करिश्माई पौधे
अचानक कहीं से वो तितली भी कौंधे
ये दिल है नादां के सम्हलता नहीं
के बगिया का मानों ये जैसा भंवर है
लचकती घास की वो बेहतरीन अदाएं
मचलते नक्श़ पे थिरकती निगाहें
आबोहवा ने यूं भर दी है झोली
दिले बागबां की उसको ख़बर है
कवि 'रवि'

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