Saturday, 15 October 2022

'पता नहीं '

आजकल ये गुमान सा क्यों है पता नहीं
न चाहते हुए भी अरमान सा क्यों है पता नहीं
ता उम्र जिसे नकारता फिरा मैं
दिल उसपे आशना क्यों है पता नहीं
देख कर उसकी तलब गोई को
जेहन में एक तकरार क्यों है पता नहीं
शामों सहर जिन खयालों में गुम था
तमन्नाएं सब्रसार क्यों है पता नहीं
अधूरी प्यास का एहसास 'रवि'
दखल में शुमार क्यों है पता नहीं
कवि 'रवि '



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