इश्के मैकदा
इश्के मैकदा क्यों बार-बार हसरत जगाता है
चाहे किसी गली से गुज़रूं मैकदा ही आता है
जलवा शराब में है तो पियाला क्यों झूमता नहीं
कितने मैख्वार इर्दगिर्द साकी पे असर आता नहीं
इश्के तमन्ना और ये तन्हाई का आलम
समां ए महफिल मुझे क्यों कर भाता नहीं
है आग तो दिल में शमा एक जला कर रख 'रवि'
अश्कों का बहना अक्सर जज्बों को भाता नहीं
बेकरारी झुलसने की परवाने की फितरत है
चर्चा ए मुहब्बत उसे अंगार तक लाता नहीं
कवि 'रवि'

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