Friday, 23 February 2024

गज़ल

अब अश्क भी पलकों से टकराके बिखर जाते है
वो लम्हे जो याद आते है जाने किधर जाते है
रुके रुके से वो जज़बात सांसों का धागा पकड़ कर
जाने कैसे रू-ब-रू होते ही उतर जाते है 
क्या बात है के बात होती कुछ भी नहीं 
वो मंज़र फिर भी अनायास नजरों में उतर जाते है 
ना आशना तू रकीबों से 'रवि' अल्फाज़ गंवाया न कर
तेरी आशनाई के सरे ग़म में कितने महबूब बिखर जाते है
कवि 'रवि'

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