गज़ल
अब अश्क भी पलकों से टकराके बिखर जाते है
वो लम्हे जो याद आते है जाने किधर जाते है
रुके रुके से वो जज़बात सांसों का धागा पकड़ कर
जाने कैसे रू-ब-रू होते ही उतर जाते है
क्या बात है के बात होती कुछ भी नहीं
वो मंज़र फिर भी अनायास नजरों में उतर जाते है
ना आशना तू रकीबों से 'रवि' अल्फाज़ गंवाया न कर
तेरी आशनाई के सरे ग़म में कितने महबूब बिखर जाते है
कवि 'रवि'

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