हद बे हद
मत पूछो किस क़दर इंतजार की हद कर ली
थी जो मुकर्रर हमने मौत भी मुल्तवी कर ली
आंखों का नूर लम्हा दर लम्हा फ़ना होता गया
होश उड़ने लगे फिर भी नब्ज़ काबू कर ली
हुई महसूस आहट जब उनके कदमों की
यक ब यक जेहन में जिंदगी भर ली
हुए दीदार जैसे ही.....उजाला सा हुआ
फिर न उलझेंगे आशनाई से....तौबा कर ली
'रवि' क्योंकर ज़माने में चर्चे आम हुए
रही बदनाम उल्फत तो क्यों सभी ने कर ली
कवि 'रवि'

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