मैं और वो
उसे आना होगा
तो आएगा
इंतिजा़र क्यों करूं
मैं जानता हूं
वो है मददगार
तकरार क्यों करूं
मंदिर की दहलीज तक
वो ही तो लाता है मुझे
दुआ में उठा भी देता है
मेरे हाथ
इसरार क्यों करूं
जिंदगी का माइना
आसान लगता है
बिन मांगे देता है वो
इज़हार क्यों करूं
सांसों की लकीरें
जब पिरोई है उसी ने
'रवि' और ज्यादा कुछ मांग कर
उसे शर्मसार क्यों करूं
कवि 'रवि'

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