Thursday, 17 October 2024

मैं और वो

उसे आना होगा 
तो आएगा 
इंतिजा़र क्यों करूं 
मैं जानता हूं 
वो है मददगार 
तकरार क्यों करूं 
मंदिर की दहलीज तक 
वो ही तो लाता है मुझे 
दुआ में उठा भी देता है
मेरे हाथ 
इसरार क्यों करूं 
जिंदगी का माइना 
आसान लगता है 
बिन मांगे देता है वो 
इज़हार क्यों करूं 
सांसों की लकीरें 
जब पिरोई है उसी ने 
'रवि' और ज्यादा कुछ मांग कर 
उसे शर्मसार क्यों करूं 
कवि 'रवि' 

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