खुसूसियत ए मैक़दा
शाम जब मय के प्याले में उतर आती है
हर तरफ साकी ही रिंदों को नज़र आती है
रंगे महफ़िल इस क़दर बदनाम क्यों है
हर शख्स को तजुर्बे की चाहत उभर ही आती है
राहे मैकदा नहीं होती है कभी आसान यारों
दर्द जज़्बात से टकराते हैं तब वो आती है
दिल की चोटों पे दवा बनती है साकी की नज़र
सुकूं की लहर दौड़ जाती है जब वो आती है
आज गर इतना खफा है समां तुझपे 'रवि'
याद रख के इश़रत की घड़ी भी आती है
कवि 'रवि'

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