जद्दोजहद
सुबह होते ही चर्चा ये आम होती है
के रात की जिंदगी तमाम होती है
सूरज ढलते ही जब फिर से शाम होती है
ख्वाहिशें मुल्तवी फिर सहर के नाम होती है
मेरा मशविरा उसने कभी लिया न लिया
जद्दोजहद की इन्तेहा मेरे नाम होती है
एक अदद से तन्हाई को समेटे बैठा है
महफ़िल में 'रवि' देख तेरी शायरी आम होती है
कवि 'रवि'

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