Thursday, 17 October 2024

जद्दोजहद

सुबह होते ही चर्चा ये आम होती है 
के रात की जिंदगी तमाम होती है 
सूरज ढलते ही जब फिर से शाम होती है 
ख्वाहिशें मुल्तवी फिर सहर के नाम होती है 
मेरा मशविरा उसने कभी लिया न लिया 
जद्दोजहद की इन्तेहा मेरे नाम होती है 
एक अदद से तन्हाई को समेटे बैठा है 
महफ़िल में 'रवि' देख तेरी शायरी आम होती है 
कवि 'रवि'

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