चंद अशयारों में
चंद अशयारों में जिंदगी
सिमट कर रह गई यारों
जो कहानी जुबां कह न सकी
कलम कह गई यारों
नाकामयाबी को गले लगा कर
चूप रहते थे मगर
दर्दे आशनाई को
दुनिया समझ गई यारों
अफसाना उल्फत कभी
रंगीन रहा होगा शायद
दिल की चोटें ही मेरी
दवा बन गई यारों
है आसमां वाला तो
कभी तजुर्बा करा दें मुझे
आबाद हकीकतें तखल्लुस में
जब्त पड़ गई यारों
बेगैरत है ज़माना तो इल्ज़ाम किसको दें
'रवि' की नज़्म भी
'कालीख ए शब' में खो गई यारों
कवि 'रवि'

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