Tuesday, 3 December 2024

सिलसिला ए सोज़

अब क्योंकर नागवार हुआ 
सिलसिला ए सोज 
ये वो शय है जो जगाती है रातों को तो
रोज़ ब रोज़
एक तूफान जो झिंझोड़े मुझे 
वक्त बे वक्त ऐ दोस्त 
इंतिजा़र क्यों इस कदर 
उसका होता है मुझे रोज़ 
आरजुओं का अंबार लिए 
आता है वो जब नज़र 
डरता हूं कहीं धड़कन उसकी 
न दब जाए किसी रोज़ 
वो दर्द जो मिलता है कांटों से 
गुलों के साथ 
ऐसे जख्मों को अलबत्ता 
छुपाता हूं रोज़ रोज़ 
एक अफसाना है लिखा जा रहा 
अजल से 'रवि'
मिटता बनता है हर किरदार 
उसके कलम से रोज़ रोज़ 
कवि 'रवि' 

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