परछाइयों से आगे
परछाइयों से आगे भी कभी निकलना सीखो
ज्वाला की तरह प्रच्छन्न होकर मचलना सीखो
सरजमीं की खिदमत में न्यौछावर जो हुए
उनके किरदारों से जीवन में संभलना सीखो
है आसमां लुभाता तो ख्वाबों को संवारो
उड़ानों को पा लो जमीं से जुडे रहना सीखो
सौगात में पाया है उसे ठुकरा ना देना कभी
वेद मंत्र शाश्वत है उन्हें संस्कार बनाना सीखो
ज्ञान का भंडार लिए बैठें है जो आसपास
उनके सानिध्य में रहकर खुद को आजमाना सीखो
हम सब की बागडोर संभाले हुआ है जो
उस परमात्मा को आत्मा से मिलाना सीखो
होती है दिक्कत ज़रूर मगर हौसला रखो
ध्येय की तरफ बढ़ते हुए विश्वास जगाना सीखो
कवि 'रवि'

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