Sunday, 6 June 2021

असर

किसी नाजनीना के रुख़सार पे 
कभी देखा था कैफे इशरत हमने
आज मेहताब भी है धुंधलायासा 
मेरी निगाहों के सामने |
किसी निखरती हुआ बहार पे
 देखी थी शबनम की चमक हमने 
आज फिजाँ भी है कुछ मुरझाईसी
मेरी निगाहों के सामने। 
किसी लमहे की तर्ज भी
तरन्नुम थी कभी मेरे लिये 
आज तो अफ़साने भी है
मरसिये से मेरी निगाहों में
बदला नहीं हूँ मै न ही
बदली है मेरी निगाहें
कुछ असरदार कर दिया है समां
तेरी बेवफ़ाई ने ।
कवि 'रवि'

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