असर
किसी नाजनीना के रुख़सार पे
कभी देखा था कैफे इशरत हमने
आज मेहताब भी है धुंधलायासा
मेरी निगाहों के सामने |
किसी निखरती हुआ बहार पे
देखी थी शबनम की चमक हमने
आज फिजाँ भी है कुछ मुरझाईसी
मेरी निगाहों के सामने।
किसी लमहे की तर्ज भी
तरन्नुम थी कभी मेरे लिये
आज तो अफ़साने भी है
मरसिये से मेरी निगाहों में
बदला नहीं हूँ मै न ही
बदली है मेरी निगाहें
कुछ असरदार कर दिया है समां
तेरी बेवफ़ाई ने ।
कवि 'रवि'

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home