ख़ामोश थी अपनी ज़ुबान
ख़ामोश थी अपनी ज़ुबान
लोग उकसाते गये
थे वाइज़ की राह पर
लोग भरमाते गये
वो एक पल भी आया
लड़खड़ाने लगे जब
उनकी फरमादारी पर
वो ही शरमाते गये
अब ये आलम है अपना
किसीकी सुनते नहीं
राह में जो भी आया
सब कुछ ठुकराते गये
कोई तवज्जो दे न दे 'रवि'
अहले मुकाम तक जाना ही है
बेशक के और तूफ़ान
कई कई और आते गये
कवि 'रवि'
