Sunday, 28 December 2025

दश्तों के साये में

दश्तों के साये में खो भी जाऊं गर कभी 
मेरी आवाज़ पर तुम मगर नाज़ करना 
दस्तूर मुहब्बत का उम्रे रफ्ता से बेदखल 
चंद सदियों तलक मुझे याद करना 
बेहतर होगा कि रहे दुनियादारी से दूर 
दिल्लगी में मसरूफ झूठी रस्मों से दूर 
किस्सा ए मुहब्बत अपने नाम भी हो लें 
नायाब तरकीब कोई ईजाद करना 
नाज़ ए मुहब्बत है कुद़रतन मिजाज 'रवि'
इन्हीं आदतों को तामील करना 
कवि 'रवि' 

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