वो लफ्जे बयां ही था शायद
वो लफ्जे बयां ही था शायद
कलेजे में तीर सा चुभ गया
उसकी जुबानी वो समझा गया
हमसे उफ़ तक भी कहा ना गया
वो लाख समझें मुझे बेदर्द-बेदिल
धड़कनों को हमसे मगर संभाला ना गया
वो था बदस्तूर हमनवा मेरा मगर
मुड़कर फिर से उसे देखा ना गया
तीरो तर्कश बेकार है कमान के सिवा
'रवि' इतना सा हुनर उसे मुझसे सिखाया ना गया
कवि 'रवि'

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