मेरी चाहत मेरी नज़र
भला और दुनिया से क्या चाहता हूं
बची उम्र को बस सुकूं चाहता हूं
अशयार मेरे ना हों भी पुरस्सर
लबों पर तुम्हारे दुआ चाहता हूं
रहूं रात-भर मंजिलों के सफर में
ख्वाबों खयालों की लंबी डगर में
हुआ रूबरू तो रहें ऐतबार
इनायत की इतनी नज़र चाहता हूं
उलझ कर रहा तालीमों के कफस़ में
लिए दर्द जीने की बेजा हवस में
'रवि' अलविदा होगी आलम से जब रूह
दुआ में तुम्हारे असर चाहता हूं
कवि 'रवि'

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