Thursday, 25 December 2025

मेरी चाहत मेरी नज़र

भला और दुनिया से क्या चाहता हूं
बची उम्र को बस सुकूं चाहता हूं
अशयार मेरे ना हों भी पुरस्सर
लबों पर तुम्हारे दुआ चाहता हूं
रहूं रात-भर मंजिलों के सफर में
ख्वाबों खयालों की लंबी डगर में
हुआ रूबरू तो रहें ऐतबार
इनायत की इतनी नज़र चाहता हूं
उलझ कर रहा तालीमों के कफस़ में
लिए दर्द जीने की बेजा हवस में
'रवि' अलविदा होगी आलम से जब रूह
दुआ में तुम्हारे असर चाहता हूं
कवि 'रवि'

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