सफ़र -ए-अकीदत
सफ़र-ए-अकीदत
हुए तर-बतर अफ़साने अक़ीदत के,
ज़माने गाते रहे वो नग्मे फ़सादत के।
दिले नादान तेरी फ़ितरत नागवार फिर भी,
क्योंकर जड़े गए किस्से बिगड़ी आदत के।
जब रातें रंगीन थीं सुबह से रिश्ता न था,
अब ख़याल आते हैं उस की इबादत के।
यूं तो ज़र्रे भी जी लेते हैं अपना इक पल,
किसलिए गाते रहे मर्सिये अपनी किस्मत के।
'रवि' चल अब तो शाम ढलने को आ गई,
छोड़ दे वो किस्से तेरी अंधेरी अबादत के।
कवि 'रवि'

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