दोस्तों के नाम दोस्ती का पयाम
दोस्तों के नाम दोस्ती का पयाम
यादों के महल में बसा हुआ है वो
जज्बों के दरीचों में बसा हुआ है वो
कभी उलजलूल बातों में नज़र आता
तो कभी चश्मे-नम से छलक जाता है वो
इतना ऐतबार है उसको मुझपर
बिना पूछे ही मेरे वास्ते पर्चा बना देता है वो
मेरा हमदर्द है हमनवां है हमसफ़र भी है
मेरी नब्ज़ की धड़कन में भी सुनाई देता है वो
कोई गर पूछता है उसका मेरा रिश्ता क्या है
हंसकर आसमां वाले की तरफ़ हाथ उठा देता है वो
दोस्तों दोस्ती में कभी दरारें होती ही नहीं
हरबार मुझ हारे हुए को जिता जाता है वो
'रवि' अल्फ़ाज़ में वो आतिश नहीं कि बयां कर दें
लम्हे-लम्हे पे रवायत की मिसाल गढ़ जाता है वो
कवि 'रवि'

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