Monday, 23 February 2026

दुआ मांगता है अरे किस जहां से

दुआ मांगता है अरे किस जहां से 
कोई खुश ना गुज़रा अभी तक यहां से 
है तेरी मुहब्बत यहां जिस किसी से 
आएंगे जलाकर तुझे बेरुखी से 
ना दौलत बनी है वफादार तुझसे 
ना दरकार किसको तेरे आशियां से 
कहानी वजूद की रह जाएगी पीछे 
खोई जब दुनिया फिर पाएगा कहां से 
'रवि' और अब कुछ ना हासिल की चाहत 
करें अलविदा और हो रुखसत यहां से 
कवि 'रवि' 



Thursday, 12 February 2026

कोई बताए ज़रा ये जहां किसलिए है

कोई बताए ज़रा ये जहां किसलिए है 
ये दौलत आसमानी यहां किसलिए है 
जो चाहूं वो हासिल किए जा रहा हूं 
तो ये बद़इत्मीनानी भला किसलिए है 
है मेहनत मुकम्मल और नतीजा बानीस्बत
मुकद्दर की तारीफ भला किसलिए है 
जरूरी जहां में तो बस तीन ही है (रोटी कपड़ा मकान)
महलों की ख्वाहिश भला किसलिए है 
'रवि' जब नहीं है अमल तेरा खुद पर 
जियूं और एक पल, हौसला किसलिए है 
कवि 'रवि' 

Wednesday, 11 February 2026

निरांजनातील वात जणू ती

निरांजनातील वात जणू ती 
देई मजला प्रभा निरंतर 
तिच्याच साठी प्राण जाहलो 
नुरले आता कसेच अंतर 
अस्तित्वच ते परस्परांवर 
साथ संगती न च गत्यंतर 
जे जे आम्हांसी दैवे दिधले 
ते ते अर्पू तयांसी सत्वर 
'रवि'षड्रिपुंचे नाट्य खरोखर 
त्वां अनुभवले ह्या अवनीवर 
कवि 'रवि' 

Saturday, 7 February 2026

संत गजानन महाराज भजन

ब्रह्मा विष्णू आणि महेश्वर 
शेगांवी बसले 
मला हे गुरू गजानन दिसले......मला हे 
माय माऊली ही भक्तांची 
आस एकची असे कृपेची
शेगांवातील सद्भक्तांच्या अंतरात वसले 
मला हे गुरू गजानन दिसले......मला हे 
तूच दयाळा आम्हां सावली 
जन्मे अमुची भरून पावली 
दर्शन घडता तुमचे मनांसी ज्ञानार्जन घडले 
मला हे गुरू गजानन दिसले....मला हे 
आज परमकृपा कल्पतरू महाराजाधिराज योगीराज परब्रह्म सद्गुरू श्री गजानन महाराजांच्या प्रकट दिनी सुचलेले हे कवन श्री सद्गुरू चरणीं अर्पण.
कवि 'रवि' 

Friday, 6 February 2026

वो लफ्जे बयां ही था शायद

वो लफ्जे बयां ही था शायद 
कलेजे में तीर सा चुभ गया 
उसकी जुबानी वो समझा गया 
हमसे उफ़ तक भी कहा ना गया 
वो लाख समझें मुझे बेदर्द-बेदिल 
धड़कनों को हमसे मगर संभाला ना गया 
वो था बदस्तूर हमनवा मेरा मगर 
मुड़कर फिर से उसे देखा ना गया 
तीरो तर्कश बेकार है कमान के सिवा 
'रवि' इतना सा हुनर उसे मुझसे सिखाया ना गया 
कवि 'रवि' 

Wednesday, 7 January 2026

वो जब भी मिलते हैं

वो जब भी मिलते हैं शिकायत करते हैं 
बिला वजह गिले शिकवे किया करते हैं 
झिझक झिझक कर पूछ लेता हूं फिर भी 
एक लम्हा तीखी नजर से देख लिया करते हैं 
जान नहीं पाता हूं आखिर इश्क क्या बला है 
तुनक मिजाजी में क्या क्या गुर रहा करते हैं 
अपनी मज़बूरी की इंतहा यही है यारों 
दिल लुटाकर भी बेगैरत हुआ करते हैं 
जागते हुए और सोते है तब भी हर दिन 
उनके पुरखयाली में हुनर आमद करते हैं 
'रवि' हुस्न वालों की बातें बला की जुदा है 
तोहमत लगा कर, हमीं पर नाज़ भी करते हैं 
कवि 'रवि'

Monday, 5 January 2026

दुनिया दारी