वो जब भी मिलते हैं शिकायत करते हैं
बिला वजह गिले शिकवे किया करते हैं
झिझक झिझक कर पूछ लेता हूं फिर भी
एक लम्हा तीखी नजर से देख लिया करते हैं
जान नहीं पाता हूं आखिर इश्क क्या बला है
तुनक मिजाजी में क्या क्या गुर रहा करते हैं
अपनी मज़बूरी की इंतहा यही है यारों
दिल लुटाकर भी बेगैरत हुआ करते हैं
जागते हुए और सोते है तब भी हर दिन
उनके पुरखयाली में हुनर आमद करते हैं
'रवि' हुस्न वालों की बातें बला की जुदा है
तोहमत लगा कर, हमीं पर नाज़ भी करते हैं
कवि 'रवि'