बेकरारी
क्यों कहे हम के जिया जाय जहाँ की खातिर हम तो जिंदा है निगाहों की हया की खातिर
मौसमे गुल तो सदा अपने बख़त के है ही ख्वाहिशे दिल है सिर्फ अब तो कली की खातिर
यूँ तो बरसात सदा होती है बरसातों में
बेकरारी है मेरी मेहताब की खातिर
पास तो है मुझे कलिजांए शीजा का
चाहता हूँ के मजा कुछ तो हो तन्हाईका
बेकरारी का सबब कुछ भी नही कहनेको
एक आवाज तहे दिल से उभर आती है
कवि'रवि'

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