इल्तज़ा
अब राह चलने को तैयार हूँ मै
अब कोई काँटा चुभता नहीं
तकदीर तुझे ठुकरा चुका हूँ मै
अब कोई चाहत लुभाती नही
मैं ही मैं दिखता हूँ मुझे हर सू
किसी चीज में फर्क अब लगता नही
तेरे दर तक तो आया हूं हे ईश्वर
तेरे दीदार से भी मन अब लगता नहीं
बस यही है पुकार के दिला दे निजात
इसके सिवा कुछ और भाता नहीं
कवि'रवि'

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