Thursday, 10 June 2021

अंध:कार

रात की परछाई तले 
साँवला जिस्म लेकर
एक चमगादड़
मधुर धुन सोचकर 
गा रहा है बेसुरे गीत
उल्लू ने तान लेकर
जोड़ी है बंदीश कि साथ
आसमान में सितारे
मुरझाने को है 
अपने यौवन पर है
अमावस कि रात
तिनके का उड़ना भी
बनकर नगाड़ का आभास
छल रहा है 
मासूम शांतता को 
अपनेही  धुन में मगन
तेज कदमों से
चला जा रहा है अंधकार
सबसे सिमटा हुआ
अटूट अंग जैसा 
फिरभी अकेला, नि:संग
कवि'रवि'

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