Saturday, 5 October 2024

वाह ये जिंदगी

 हाथों की लकीरों से भला 
काम कभी चलता है
अधूरे कामों की चिंता के साथ
अपना दिन निकलता है
हाथ धोकर देख लिया
फिर भी
एक बार यह सोचकर
हो ना हो कोई तिनका खुशकिस्मती का
किसी कोने में लकीर के
क्या सचमुच मिलता है
भूत-वर्तमान और भविष्य
घटनाओं का महज़ एक सिलसिला है
रोने के सिवाय जन्म के साथ
कभी कुछ और नहीं मिलता है
जिनके भरोसे जन्म लिया
वे भी तो हो जाते है फ़ना 
जेहन को सांस का साथ
कहां बदस्तूर मिलता है
तेरी हस्ती की लिखावट 'रवि' दर असल
तेरे हाथों में थी
लकीरों के भरोसे भला
किसी का काम कभी चलता है
कवि 'रवि'

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