बेसब्र की इंतहा
वो गलतियां सरासर करते गए
हम और भी सब्रसार होते गए
खता फिर भी हम पर ही लादी गई
वो जब भी जज्बों को खोते गए
तबस्सुम अधर पर आती रही
निगाहों से कत़ल वो यूं करते गए
आगाज़ ए मुहब्बत जताती रहीं
नावाकिफ अंजाम तक जाते गए
'रवि' एक लम्हे की ख्वाहिश रही
पुरी उम्र हमपर उड़ाते गए
कवि 'रवि'

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