Wednesday, 2 October 2024

बेसब्र की इंतहा

 

वो गलतियां सरासर करते गए 

हम और भी सब्रसार होते गए 

खता फिर भी हम पर ही लादी गई 

वो जब भी जज्बों को खोते गए

तबस्सुम अधर पर आती रही 

निगाहों से कत़ल वो यूं करते गए 

आगाज़ ए मुहब्बत जताती रहीं 

नावाकिफ अंजाम तक जाते गए

'रवि' एक लम्हे की ख्वाहिश रही 

पुरी उम्र हमपर उड़ाते गए

कवि 'रवि'

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