अपनी हस्ती के शहंशाह है हम
माना के फलक पे सितारे है करोड़ों आबाद
दोज़ख के शहंशाह हमीं हैं उनके बाद
दर्या का ज़र्फ़ इतना के शफ़क तक न पहुंचे
अपनी एजाद से मुकम्मल हुआ वहां जो भी है आबाद
दर्द की गहराई क्योंकर ज़ख्म उकेरती है
क्या कम है जितना हुए पहले ही बर्बाद
अश्कों की दीवारें नज़र धुंधलाती है
मिली गर न मंजिल 'रवि' किसे सौंपेगा सौगात
कवि 'रवि'

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