Monday, 30 September 2024

अपनी हस्ती के शहंशाह है हम

माना के फलक पे सितारे है करोड़ों आबाद 

दोज़ख के शहंशाह हमीं हैं उनके बाद 

दर्या का ज़र्फ़ इतना के शफ़क तक न पहुंचे 

अपनी एजाद से मुकम्मल हुआ वहां जो भी है आबाद 

दर्द की गहराई क्योंकर ज़ख्म उकेरती है 

क्या कम है जितना हुए पहले ही बर्बाद 

अश्कों की दीवारें नज़र धुंधलाती है 

मिली गर न मंजिल 'रवि' किसे सौंपेगा सौगात 

कवि 'रवि'

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