Tuesday, 26 August 2025

धर्म का अभ्यास

Thursday, 7 August 2025

दोस्ती के नाम एक मुक्तसर सी नज़्म


दोस्ती के नाम एक मुक्तसर सी नज़्म 
दोस्त जज्बों की कद्र करने वाले होते हैं 
हर उम्र में हौसला बढ़ाने वाले होते हैं 
एक बार की दोस्ती 
ताउम्र बरकरार रहती है 
तकरार कभी कभार हो भी जाए अगर 
माफी के लिए हकदार होती है 
दोस्तों की रुसवाई जिसपे गुज़रती है 
उसकी दुनिया बहुत बेकार होती है 
कवि 'रवि'

Monday, 4 August 2025

भक्ति बोध

श्रावण मास में भगवान शिव की उपासना में बहुत: समूचा भारत व्यस्त रहता है। उत्तर भारत में चांद्रमास के अनुसार और दक्षिण भारत में सौरमास के अनुसार उपासना काल माना जाता है। अर्थात छः सप्ताह भक्तगण भगवान शिव की कृपा पाने के लिए भक्ति में रममाण रहते हैं।
ऐसा ही कुछ एक मंदिर में पूजा-अर्चना करने वाले पुजारी तथा मंदिर की सिढीयों पर बैठ कर भीख मांगने वाले भीखारी, इन दो श्रद्धावानों के परलोक गमन के बाद क्या हुआ उसका वर्णन करती ये कहानी है।
पुजारी रोज तड़के ही मंदिर में आकर देवालय और गर्भगृह की स्वच्छता पूर्ण सेवाभाव से करता था और भीखारी भी उसी समय मंदिर का परिसर पूर्ण सेवाभाव से स्वच्छ करता था।
दशकों से दोनों का यह क्रम बिना किसी अवरोध के चला आ रहा था, एक दूसरे से इस तरह एक प्रेमभाव में बंधे हुए थे।
जब कभी श्रद्धालु मंदिर में आते थे, वे पुजारी की पूछ परछ करते थे और उचित दान दक्षिणा देकर कृतकृत्य हो कर बाहर निकलते थे।
बाहर भीखारी सिढीयों के पास बैठ कर जाने वाले को 'ईश्वर तुम्हारा भला करें ' कहकर 'ईश्वर के नाम पर देकर जाओ' ऐसी गुहार लगाता था।
दोनों का गुजारा यथास्थिति होता था। 
जब भगवान का बुलावा आया तो दोनों का मृत्यु एक ही समय हुआ और दोनों यमलोक पहुंचे।
यमराज की दृष्टि पड़ते ही उन्होंने भिखारी को अगली पंक्ति में और पुजारी को पिछली पंक्ति में खड़ा कराया। तनिक आश्चर्य से भीखारी उनकी ओर देखने लगा और न रहकर उसने यमराज से पूछ ही लिया, 'हे धर्मराज न्याय अन्याय का यथार्थ फैसला करने वाले भगवान यमराज ' आपने कदाचित गलती से मुझे पहली पंक्ति में खड़ा कराया है। मुझसे अधिक पुण्य के धनी पुजारी जी है अतः उनकी पात्रता मुझसे अधिक है। ऐसे में पहली पंक्ति में खड़ा रहकर मैं असहज महसूस कर रहा हूं, आप न्याय कीजिए।
उसकी बेबाक प्रार्थना सुनकर यमराज हंस पड़े और बोले हे अनभिज्ञ आत्मा, तुम अब इहलोक को त्यागकर यमलोक पहुंचे हो जहां हर किसी को औचित्य के अनुसार ही स्थान मिलता है।
अब तुम आगे और पुजारी पीछे ऐसा क्यों है उसका समाधान देता हूं सुनो,कहकर यमराज बताने लगे।
वैसे तो तुम दोनों ही भगवान शिव के निस्सिम भक्त हो और तुम्हारे कर्म भी पुण्य प्रभाव से युक्त है तथापि तुम्हारा एक कर्म पुजारी से बढ़कर है और वह है कि तुम हर दिन हर पल हरेक दर्शनार्थी को भगवान तुम्हारा भला करें ऐसा कहते थे जबकि पुजारी उन्हें भगवान तुम्हारी सभी मनोकामनाएं पूरी करे ऐसा कहते थे।
दोनों के वचन में अंतर यही है कि पुजारी भक्त के मन में भावना जागृत होने की अवस्था उत्पन्न कर दिया करते थे और तुम उन्हें निर्भाव निश्चिंत हो कर जीवन यापन करने के लिए आश्वस्त किया करते थे। 
भावना भले ही अच्छी हो, उदात्त हो किन्तु उसे उत्पन्न कराने में पुजारी कारण बनते रहे और तुम भक्तोंको निर्मोह बनाने में कारण बनते रहे।
यही स्थिति तुम दोनों की पंक्ति तय करती है। अतः बिना किसी संकोच के तुम जहां खड़े हो उसे उचित समझो।
कहानी का सारांश यह है कि, हम जो कुछ भी अपने जीवन काल में करते हैं उसका सूक्ष्म परिणाम भी हमारी स्थिति को कारक बनता है।
राम बोलो भाई राम 
जय श्री राम जय जय श्री राम 🙏 
ॐ नमः शिवाय 
कवि 'रवि'