मेरा मंजिल की तरफ जाना
मेरा मंजिल की तरफ जाना भी
उसको नागवार गुज़रा
शीशे बिछाता रहा
जिस रास्ते से मैं गुज़रा
फलक पे बैठा वो सब देखता रहा मगर
मूंह फेर कर बैठा
जूं ही मेरे आगे कारवां गुज़रा
बिछी बिसात पर चलना
तेरी फितरत का हिस्सा सही
तेरी शह और मात की खातिर
देख उतावले पन में ज़माना गुज़रा
वो सिमटते रहे बेइंतहा
अपनी खुशगोई के लिए
लुटाने की तलफगोई में
मेरा हर लम्हा गुज़रा
'रवि' आलमें अकीदत में
तमन्नाओं को झोंक दे
याद करते तेरी हसरतें नाकाम
सुगबुगाते तेरे बाद ज़माना गुज़रा
कवि 'रवि'

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