Sunday, 21 September 2025

मेरा मंजिल की तरफ जाना

मेरा मंजिल की तरफ जाना भी
उसको नागवार गुज़रा
शीशे बिछाता रहा
जिस रास्ते से मैं गुज़रा
फलक पे बैठा वो सब देखता रहा मगर
मूंह फेर कर बैठा
जूं ही मेरे आगे कारवां गुज़रा
 बिछी बिसात पर चलना
तेरी फितरत का हिस्सा सही
तेरी शह और मात की खातिर
देख उतावले पन में ज़माना गुज़रा
वो सिमटते रहे बेइंतहा
अपनी खुशगोई के लिए
लुटाने की तलफगोई में
मेरा हर लम्हा गुज़रा
'रवि' आलमें अकीदत में
तमन्नाओं को झोंक दे
याद करते तेरी हसरतें नाकाम
सुगबुगाते तेरे बाद ज़माना गुज़रा
कवि 'रवि'

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