Saturday, 21 June 2025

ऐ जिन्दगी तेरी चाह में

ऐ जिन्दगी तेरी चाह में 
क्या क्या न हम करते रहे 
कल के जीने की खुशी में 
रोज ही मरते रहे 

एक लम्हा वो सुकूं का 
आज होगा रू ब रू 
इस तमन्ना के सहारे 
कल को दफ़नाते रहे 

वो दिये की लौ जो हर पल 
राहे मुकद्दर थी बनीं 
ख़ाक कजरी मानकर 
उसको बुझाते ही रहे 

क्या नहीं समझे 'रवि' 
के जिंदगी मंजिल नहीं 
फिर भी मैय्यत पे किसी के 
मर्सिये गाते रहे 

कवि 'रवि' 

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