Wednesday, 16 July 2025

लम्हों की माला

लम्हे लम्हे को पिरोकर 
इंतजार की माला बनी 
तस्वीर उसकी सजाकर उससे 
हमने नाकाम हसरतें चुनी 

एक खयाल जेहन में 
चुभता रहता है रात दिन 
क्या ख़ाक में मिलेगी हस्ती 
उसके आखरी दीदार के बिन 

दश्ते तन्हाई क्योंकर 
चीखती रहती है कानों में 
मेरी आवाज़ खो गई जैसे 
इंसां के बियाबानों में 

'रवि' अब आस ये कैसी तड़प जगाती हैं 
लम्हे के अंत में ही क्या खुदाई काम आती है 
कवि 'रवि'

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