लम्हों की माला
लम्हे लम्हे को पिरोकर
इंतजार की माला बनी
तस्वीर उसकी सजाकर उससे
हमने नाकाम हसरतें चुनी
एक खयाल जेहन में
चुभता रहता है रात दिन
क्या ख़ाक में मिलेगी हस्ती
उसके आखरी दीदार के बिन
दश्ते तन्हाई क्योंकर
चीखती रहती है कानों में
मेरी आवाज़ खो गई जैसे
इंसां के बियाबानों में
'रवि' अब आस ये कैसी तड़प जगाती हैं
लम्हे के अंत में ही क्या खुदाई काम आती है
कवि 'रवि'

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