प्रातः की बेला
हर शाम रंगीं हो न हो
पर सुबह सुहानी होती है
सूरज की किरणों के संग
धरती धुन सुनाती है
आंगन में रंगोली मधुरम
गृह लक्ष्मी यूं बनाती है
द्वार पे ग्वाले की ललकारी
धवल सुधा घर लाती है
पंछी बोले कोयल गाए
उन्मुक्त घड़ी जब आती है
मन में उमंग की एक नई
आशा उद्भव होती है
ऋतु ऋतु की अपनी वो दुनिया
हर सुबह विलक्षण होती है
जागो सुबह की अवधि में जो
हर क्षण उत्साह जगाती हैं
कवि 'रवि'

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