Saturday, 27 September 2025

मैकदा और मैं

मैकदे से निकल जाता हूं तो 
शुरू हो जाता है मेरा ज़िक्र 
लोग कहते ये कैसा है शख्स 
खुद की चिंता न दुनिया की फ़िक्र 
साकी के रूबरू होते ही 
उसपे आ जाता है सुरूर 
जाम तलब होते है 
महफ़िल करती है गुरूर 
इशरते महफ़िल समझते हैं मुझे 
अश्कों का अंबार झुपा रखता हूं मगर 
क्या ग़म क्या तन्हाई 
सब ढकोसला सा है 
'रवि' जाम ए तरन्नुम 
सुकून दे जाता है अक्सर 
कवि 'रवि' 

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