बेरुखी ही सही
बेरुखी ही सही मुझे पहचान तो लिया
मुज़ाकरात लफ़्ज़ों से ना हो ना सही
मगर चश्मों ने चश्मों से बदस्तूर किया
सिलसिला ए इश्क अजल से रुका था
बिना कुछ कहे ही आबाद हुआ
दिल की दिल से गूफ्तगू एक अजाब सा है
इशारा किसी क़दर किया ना किया
वो ज़ख्म उनसे जो हासिल हुए थे कभी
फहम शातिर इतना के कभी भरने ना दिया
ये आखरी इल्तेजा है के आओ ना फिर कभी
'रवि' उनकी हरकतों ने जीने ना दिया, मरने ना दिया
कवि 'रवि'

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