Wednesday, 24 December 2025

बेरुखी ही सही

बेरुखी ही सही मुझे पहचान तो लिया 
मुज़ाकरात लफ़्ज़ों से ना हो ना सही
मगर चश्मों ने चश्मों से बदस्तूर किया 
सिलसिला ए इश्क अजल से रुका था 
बिना कुछ कहे ही आबाद हुआ 
दिल की दिल से गूफ्तगू एक अजाब सा है 
इशारा किसी क़दर किया ना किया 
वो ज़ख्म उनसे जो हासिल हुए थे कभी 
फहम शातिर इतना के कभी भरने ना दिया 
ये आखरी इल्तेजा है के आओ ना फिर कभी 
'रवि' उनकी हरकतों ने जीने ना दिया, मरने ना दिया 
कवि 'रवि' 

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home