Thursday, 18 December 2025

बेसब्र मुहब्बत

वो बेसब्र इतने की जागते हुए ही ख्वाब देखते हैं 
हमारी चुप्पी में ही उनके मुताबिक जवाब देखते हैं 
ना इशारा ना गूफ्तगू ना मुजाहिरा ही किया 
ना जाने किस आइने वो इजहार देखते हैं 
अजल से मुकद्दर हमें धोखा ही अता करता रहा 
बेमिसाल है उनके खयालात वो ऐतबार देखते हैं 
मायूसी के अब्र दिले आसमां पे छाए रहते हैं 
'रवि' तुम्हारी पेशानी पर वो ईश्के खुमार देखते हैं 
कवि 'रवि'

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home