बेसब्र मुहब्बत
वो बेसब्र इतने की जागते हुए ही ख्वाब देखते हैं
हमारी चुप्पी में ही उनके मुताबिक जवाब देखते हैं
ना इशारा ना गूफ्तगू ना मुजाहिरा ही किया
ना जाने किस आइने वो इजहार देखते हैं
अजल से मुकद्दर हमें धोखा ही अता करता रहा
बेमिसाल है उनके खयालात वो ऐतबार देखते हैं
मायूसी के अब्र दिले आसमां पे छाए रहते हैं
'रवि' तुम्हारी पेशानी पर वो ईश्के खुमार देखते हैं
कवि 'रवि'

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