Wednesday, 10 December 2025

दिल की दरयाफ़्त

इक आह की पुकार बेजुबान भी महसूस करते हैं

जज्बों की दुहाई देते इंसान मगर मूंह फेर कर जाते हैं

कोई ज़ख्म नामुराद....दिल से लहू बहाता है

रहगुजर पर नाजरीन....मुस्कराहटें याद रखते हैं

वो अहदे उल्फत.......कहीं ताबूत में दफ़नाकर

नये वादों की हरदम........ तस्दीक बजा लातें हैं

करिश्मा ए कुदरत 'रवि'.... हैरतअंगेज इतना

हमारे कुर्निस को वो तोहमत लगा देते हैं

दुवा की इंतहा हो गई मगर चाहतें रुकी नहीं

गुनाह चाहें वो करें...... इल्ज़ाम हमीं पर लाते हैं

कवि 'रवि'

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home