Saturday, 6 December 2025

जज़्बा ए इश्क

नजरें क़ातिल की जब अश्क बहाती है 
बिना औजार के हमारी जान निकाल लेती है 
इश्क जुनून अक्सर ग़म ही बहाल करता है 
बेबस सा मन फिर भी क़ातिल को 
चाहता है 
जज़्बा ए इश्क क्यों इतना संगीन 'रवि'
क़त्ल होता है आशिक पर नाम नहीं लेता है
कवि 'रवि' 

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