बुरा ना मानो होली है
उनके आंखों में देखते थे हजारों
लगता था चाहत उनकी हमीं पर है यारों
आव देखा न ताव बस ब्याह कर बैठे
आंखों की गहराई से अभी तक ना उभर सके
उनकी आंखों का खौफ आजकल इतना हावी रहता है
वो कहीं रुसवा ना हो इसलिए यह दिलो दिमाग जागता रहता है
क्या ही तासीर है इस अजीब पिंजड़े की
वो कहती हैं कई बार चले जाओ
पर हिंमत नहीं होती है उड़ने की
अब बस लानत भेजता रहता हूं किस्मत के लिखने वाले को
हंसना मत उसका जवाब आता है
यह कहते हुए
अरे नादान शुक्र कर तुझे जो भी दिया है सोच समझकर दिया है
तेरे पड़ोसी को तुझसे सब अलाहिदा दिया है
एकबार झांकना ज़रूर उसके गिरेबान में
तू पाएगा खुशियां ही खुशियां भरी पडी है तेरी राहों में।
कवि 'रवि'

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