इस शहर की आबोहवा
इस शहर की आबोहवा कुछ धुंधला गई है
फिर बियाबानों की तरफ जाने की घड़ी आ गई है
गाड़ियों-मशीनों-लाऊडस्पीकरों की आवाज कर्कश
पंछियों की किलकारियां जाने कहां खो गयी है
सुबह सवेरे उड़ते पंछियों को, सूरज को भुलाकर
बड़े बड़े हवाई बेडों को देखने की नौबत आ गई है
मैं और मेरा नन्हा-सा दिल फिर से सपने संजोता है
फिर बियाबानों की तरफ जाने की घड़ी आ गई है
कवि 'रवि'

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