Sunday, 8 March 2026

इस शहर की आबोहवा

इस शहर की आबोहवा कुछ धुंधला गई है 
फिर बियाबानों की तरफ जाने की घड़ी आ गई है 
गाड़ियों-मशीनों-लाऊडस्पीकरों की आवाज कर्कश
पंछियों की किलकारियां जाने कहां खो गयी है 
सुबह सवेरे उड़ते पंछियों को, सूरज को भुलाकर 
बड़े बड़े हवाई बेडों को देखने की नौबत आ गई है 
मैं और मेरा नन्हा-सा दिल फिर से सपने संजोता है 
फिर बियाबानों की तरफ जाने की घड़ी आ गई है 
कवि 'रवि'

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