मस़रूफियत
मैं मसरूफ हूं मुझको बनाने में
तजुर्बों के किस्से कलमबंद सुनाने में
ये चाहत बला की तलब बन गई है
उलझ सा गया हूं इसे रिझाने में
अक्सर कोशिशें नाकाम बनती रही
बड़ी देर गुज़री खुदी को जताने में
है नाजुक बड़ी ऐ दिल ये पल की सवारी
उम्र गुज़री है तमाम पलक पे सजाने में
किसे क्या कहूं अपनी आदत ही वैसी
'रवि' खोज तुझको बिखरे खजाने में
कवि 'रवि'

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home