Friday, 21 August 2026

मस़रूफियत

मैं मसरूफ हूं मुझको बनाने में 
तजुर्बों के किस्से कलमबंद सुनाने में 
ये चाहत बला की तलब बन गई है 
उलझ सा गया हूं इसे रिझाने में 
अक्सर कोशिशें नाकाम बनती रही 
बड़ी देर गुज़री खुदी को जताने में 
है नाजुक बड़ी ऐ दिल ये पल की सवारी 
उम्र गुज़री है तमाम पलक पे सजाने में 
किसे क्या कहूं अपनी आदत ही वैसी 
'रवि' खोज तुझको बिखरे खजाने में 
कवि 'रवि'

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