Friday, 16 October 2026

गझल: आयुष्याशी लढलो इथवर

आयुष्याशी लढलो इथवर 
आता विसावा पाहिजे 
काळसर्पा तुज विनंती 
एक चावा पाहिजे 
काळ वेळाची युती 
एकदा व्हावी अशी 
निष्पर्ण वृक्षासी आता 
ठिणगी मिळाया पाहिजे
वावटळ अंतर्मनातील 
शमली ना अजुनी जरी 
विस्तवाची राख झाली 
हे कळाया पाहिजे 
पंचतत्वांच्या ऋणांची 
मांडू मी गणिते कशी 
'रवि' राहिला जो शेष अजुनी 
तो जुळाया पाहिजे 
कवि 'रवि' 

Monday, 28 September 2026

निळ्या निळ्या आकाशात

निळ्या निळ्या आकाशात बगळ्यांची रांग 

येऊ कां रे बगळे दादा सांग सांग सांग 


काऊ दादा डोकावतो झाडामधुनी 

चिऊताई चिव चिव करी पानांमधुनी 

पोपटांची किलबिल वाटे गोड किती छान 

येऊ कां रे बगळे दादा सांग सांग सांग 


मैनाबाई येती बघा खिडकी वरी 

विलक्षण नियंत्रण आवाजावरी 

एका क्षणी भासे जणू जमलं सारं रान 

येऊ कां रे बगळे दादा सांग सांग सांग 


कवि 'रवि' 

Monday, 31 August 2026

खुद ही से पूछता रहता हूं एक सवाल

खुद ही से पूछता रहता हूं एक सवाल 
क्यों मचा रहता दिमाग में अक्सर बवाल 
मेरी ही बागडोर मेरे हाथ में नहीं है तो 
दूसरों पर ज़ब्त कर लूं क्या लाज़मी है ये मवाल 
क्या शाम का रात में तब्दील होना फितरतन समझें 
फिर रात के होने का क्यों कर बना हुआ है मलाल 
तनहा गुज़रती हैं रातें तो महफ़िल में शरीक हों 
सहर भी तो बा जाब्ता लेकर आती है बिलाल 
सुबह शाम रात और दिन पर अपना कोई इख्तियार नहीं 
'रवि' यूं ही चला चल बनाकर कुदरत को मिसाल 
कवि 'रवि'

Friday, 28 August 2026

विसरू जरी पहातो

विसरू जरी पहातो तरी मी तृषार्त आहे 
माझ्यातल्या मला मी शोधीत जात आहे 
एकेक जख्म़ रिसतो रक्ताळल्या स्वभावे 
मीठ त्यावरी आणि मी चोळीत जात आहे 
'आशा' कशात नुरली समजावितो स्वतः ला 
अन् क्रुद्ध भावनांना जाळीत जात आहे 
हे काय जाहले की 'पद दलित' मानताती 
मी त्या छुप्या खुणांना मोडीत जात आहे 
आता कवेत नाही ते 'आसमंत' जेंव्हा 
अपुल्याच कल्पनांना खोडीत जात आहे 
झिडकारल्या देहाला कुरवाळितो कशाला 
'रवि' खेळ मांडला तो उधळीत जात आहे 
कवि 'रवि' 

Friday, 21 August 2026

मस़रूफियत

मैं मसरूफ हूं मुझको बनाने में 
तजुर्बों के किस्से कलमबंद सुनाने में 
ये चाहत बला की तलब बन गई है 
उलझ सा गया हूं इसे रिझाने में 
अक्सर कोशिशें नाकाम बनती रही 
बड़ी देर गुज़री खुदी को जताने में 
है नाजुक बड़ी ऐ दिल ये पल की सवारी 
उम्र गुज़री है तमाम पलक पे सजाने में 
किसे क्या कहूं अपनी आदत ही वैसी 
'रवि' खोज तुझको बिखरे खजाने में 
कवि 'रवि'

Tuesday, 11 August 2026

दोस्तों के नाम दोस्ती का पयाम

दोस्तों के नाम दोस्ती का पयाम 

यादों के महल में बसा हुआ है वो
जज्बों के दरीचों में बसा हुआ है वो
कभी उलजलूल बातों में नज़र आता
तो कभी चश्मे-नम से छलक जाता है वो
इतना ऐतबार है उसको मुझपर
बिना पूछे ही मेरे वास्ते पर्चा बना देता है वो
मेरा हमदर्द है हमनवां है हमसफ़र भी है
मेरी नब्ज़ की धड़कन में भी सुनाई देता है वो
कोई गर पूछता है उसका मेरा रिश्ता क्या है
हंसकर आसमां वाले की तरफ़ हाथ उठा देता है वो
दोस्तों दोस्ती में कभी दरारें होती ही नहीं
हरबार मुझ हारे हुए को जिता जाता है वो
'रवि' अल्फ़ाज़ में वो आतिश नहीं कि बयां कर दें
लम्हे-लम्हे पे रवायत की मिसाल गढ़ जाता है वो
कवि 'रवि' 

Saturday, 8 August 2026

इत्तेफ़ाक न था

मेरा मंजिल की तरफ जाना इत्तेफाक न था 
जाम ओ महफ़िल को ठुकराना इत्तेफाक न था 
इल्ज़ाम ए बेवफाई साकी का सहकर भी 
सरेराह कांटों पे चलना महज़ इत्तेफ़ाक न था 
एक अर्सा लगा है इस मरहले को सुलझाने 
छालों पर मरहम ना लगाना इत्तेफ़ाक न था 
आरजूओं तमन्नाओं का दौर गैर लाज़मी है अब 
इरादों का इस कदर सख़्त होना इत्तेफ़ाक न था 
'रवि' आंधी तूफ़ान फितरतें मूंह मोड़ चुकी तुझसे 
तेरा संग से सख्त हो जाना इत्तेफाक न था 
कवि 'रवि'