खुद ही से पूछता रहता हूं एक सवाल
खुद ही से पूछता रहता हूं एक सवाल
क्यों मचा रहता दिमाग में अक्सर बवाल
मेरी ही बागडोर मेरे हाथ में नहीं है तो
दूसरों पर ज़ब्त कर लूं क्या लाज़मी है ये मवाल
क्या शाम का रात में तब्दील होना फितरतन समझें
फिर रात के होने का क्यों कर बना हुआ है मलाल
तनहा गुज़रती हैं रातें तो महफ़िल में शरीक हों
सहर भी तो बा जाब्ता लेकर आती है बिलाल
सुबह शाम रात और दिन पर अपना कोई इख्तियार नहीं
'रवि' यूं ही चला चल बनाकर कुदरत को मिसाल
कवि 'रवि'

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