वो रात जिस को कभी
वो रात जिस को न कभी भूल सके हम
बा वफ़ा भी, लेकिन जिक्र कर न सके हम
चाहतें हजार उनकी निभाने की ललक थी
हुए रूबरू तो कुछ भी कह न सके हम
अज़ल और फ़ज़ल दोनों ही से बेगुमान रहे
ताउम्र बदस्तूर कभी जी न सके हम
चल आज 'रवि' उस दीवार में सेंध लगाएं
जिस पे सर पटक के सुकून पा न सके हम
लकीरें आदतन उलझती है अनजान थे
तकदीर से लिपट गई कब ये जान न सके हम
कवि 'रवि'
