Thursday, 30 April 2026

वो रात जिस को कभी

वो रात जिस को न कभी भूल सके हम 
बा वफ़ा भी, लेकिन जिक्र कर न सके हम 
चाहतें हजार उनकी निभाने की ललक थी 
हुए रूबरू तो कुछ भी कह न सके हम 
अज़ल और फ़ज़ल दोनों ही से बेगुमान रहे 
ताउम्र बदस्तूर कभी जी न सके हम 
चल आज 'रवि' उस दीवार में सेंध लगाएं
जिस पे सर पटक के सुकून पा न सके हम 
लकीरें आदतन उलझती है अनजान थे 
तकदीर से लिपट गई कब ये जान न सके हम 
कवि 'रवि' 

Thursday, 23 April 2026

कविता: वणव्यांच्या लोटातून...

वणव्यांच्या लोटातून वाहणारी वाट ती 
मजला अशी का खुणविते 
ज्वलनाच्या पोटातून निर्मिलेल्या ह्या जीवाला 
ती बरे कां हिणविते 
एक चिंगारी व्यथेची दग्ध करुनी रात्र सारी 
कां सकाळी शमविते 
जीवनाला जीवनाच्या सार गर्भा पासुनी 
दूर ती कां ढकलिते 
कोणत्या कूष्मांतुनी प्रसविलेले प्रस्थ म्हणुनी 
अंतरी कां भिनविते 
येथला सारा पसारा निर्मिला त्याने जरी
मज मोहमाया भुलविते 
शिशिराच्या झडपडीला पालवी पुन्हा नव्याने 
कां बरे हो फुलविते 
वणव्यांच्या लोटातून........
कवि 'रवि'

Sunday, 19 April 2026

एक नाज़ुक सी तमन्ना

ज़माने भर की खुशियां तेरे कदमों में ला के भर दूं 
मेरा बस चले तो नाकामयाबी को दफ़न ही कर दूं 
हर इक कोशिश होती है मेरी तेरे वास्ते ही 
शामों सहर को हौसले से भर कर तूझे पेश कर दूं 
ये बेदर्द ज़माना चाहे जितना भी सितम कर ले 
लुटाकर मुझे मैं तेरे चेहरे पे मुस्कराहट भर दूं 
दस्तूर ए मुहब्बत है वफ़ा की खातिर कुर्बान हो जाएं 
तेरे साथ मिलकर मैं बेमुरव्वत तकदीर को नाकाम कर दूं 
आबोहवा मेरी खुशमिजाजी को कितनी ही ठेंस लगाये 
मैं हरेक रहमों करम में तेरी शुक्रगुजारी भर दूं 
इक आह भी तेरे लबों से निकल आए तो यकीन रख 
मैं काइनात को तेरे कदमों पर निछावर कर दूं 
कवि 'रवि'

Thursday, 16 April 2026

गझल: गे लेखणी थांबू नको

गे लेखणी थांबू नको 
अजुनी व्यथा जीवंत आहे 
समजू नको गे तू कधीही 
ह्या कथेला अंत आहे 
जीवनाला झोडपूनही 
श्वास कां कधी थांबला 
रक्तिमा वर क्षार मर्दुनी 
काळ बघ हसतोच आहे 
भाग्य अन कर्मास देती 
दूषणे जव ते साध्य नाही 
येथल्या नियमांस अजुनही 
पूर्णतेची आस आहे 
एक धागा बांधुनी 
सात जन्माचा भरोसा 
ठेविते जी माय गृहिणी 
रोज पान्हा पाजुनी ही 
तव संसार कां अतृप्त आहे 
जोडण्या तो हार पुष्पें 
छेदुनी घेती स्वभावे 
आसवांचे मेघ वर्षुनीही 
भावना कां शुष्क आहे 
रात्र वैरी जाहली बघ 
नसत्या प्रथांना चिंतुनी
भेटला तो सूर्य तरीही 
अंधार मनींचा दाट आहे 
कवि 'रवि'