इन्सान
इस सुनहरे दश्त़ में
लबालब इश़रतें चारों तरफ
इस कदर फना है वक्त
शब भी सहर सी गुमां होती है
सुना था वस्ल में भी होती है तनहाईयाँ
इन्साँ के दश्त़ भी विरान नजराते है
क्यों हो कोई रूबरू चाहे भी हो हमसफर हमदर्द यहाँ के लोग कहाँ होते हैं
न सुने कोई चीख न पुकार
न दिल की आवाज
हर बात से टलने के बहाने होते हैं
इक मैं खोजूँ मिले कोई हमनफस्
जर्रे जर्रे में यहाँ खुदी के अफसाने होते हैं खुदगर्ज इन्सानों के शहर कहाँ आबाद
दिल से मुफलिस, बेकद्र, बेहया होते हैं
कवि'रवि'

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