चढता सूरज
(आज जवानी पर इतराने वाले कल पछताएगा
इस कव्वाली में चार लाइनें जोड़ने का प्रयास)
जिंदगी मुसाफीर है
मौत उसकी मंजील ई
कश्ती किसकी माँझी कौन
कुछ न तुझको हासील है
वक्त के शिकंजे में
इस कदर बँधा है
दिखती राह ठुकराकर बन चुका है अंधा तू
ये समां जवानी का
खत्म हो ही जायेगा
देखता रहेगा तू
वक्त ढल ही जायेगा
गर्द से ही उठनेवाले
गर्द बनके जायेगा
चढता सूरज घिरे घिरे
ढलता है ढल जायेगा
कवि'रवि'

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