आस
मंजिल मंजिल राहें राहें
भटकते कदमों के साथ
आशा निराशा के हाथ
बिकते बिकाते यहां तक
आरज़ू चली आई हैं
दर्या दर्या सागर सागर
टूटे चप्पू से ये हाथ
धकेलते जा रहें हैं
फूटी नैया को
भीतर मुसाफिर अंजान
नजरों से ओझल किनारा
चला जा रहा है वो
रात के अंधेरे में
साथ देते हुए चमगादड़
और सन्नाटा लेकर
मुसाफिर जा रहा है
सुबह की आस लेकर
शहर की दिशा अंकित कर
होगी ज़रूर होगी
आगाज़ की इंतहा होगी
अहले सफ़र की सुहानी
एक मंजिल जरूर होगी
कवि'रवि'

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